बैंकों और टैलीकॉम इंडस्ट्री से जुड़ेगी फेशियल रिकोगनाइजेशन तकनीक

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Saturday, December 02, 2017-2:35 PM

जालंधर : डाटा चोरी को लेकर कई तरह की खबरे सामने आ रही हैं जिनमें स्मार्टफोन व एप्प के जरिए डाटा चोरी होने की बात कही गई है। इन्हीं बातों पर ध्यान देते हुए ऑस्ट्रेलियाई सरकार दुनिया में सबसे पहले फेशियल रिकोगनाइजेशन तकनीक को टैलीकोम्स और बैंक्स में शुरू करने की योजना बना रही है। द गार्डियन को ऐसे डाक्यूमेंट्स मिले हैं जिनमें बताया गया है कि देश के अटार्नी जनरल कार्यालय ने टैलीकोम्स और बैंक्स को वर्ष 2018 तक फेशियल रिकोगनाइजेशन तकनीक पर टैस्ट शुरू करने की बात कही है। माना जा रहा है कि यह तकनीक फ्रॉड से बचने व कस्टमर्स को वैरीफाई करने के लिए काफी काम की साबित होगी। सरकार दुनिया को बताना चाहती है कि प्राइवेसी के मामले में वह सबसे आगे चल रही है। 
 

प्राइवेसी को बढ़ाना चाहती है सरकार
ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने प्राइवेसी को बढ़ाने के लक्ष्य को लेकर ही यह अहम कदम उठाया है। आपको बता दें कि लाइसेंस और पासपोर्ट बनवाते समय तस्वीर क्लिक करवाने के जैसी पक्रिया करने पर फेशियल रिकोगनाइजेशन तकनीक काम करेगी और यूजर को उसके अकाऊंट से जुड़ी सभी तरह की परमिशन्स दे देगी। ऑस्ट्रेलियाई सरकार का मानना है कि इस तकनीक से देश की सिक्योरिटी को बढ़ाने के साथ आईडेंटटी फ्रॉड यानी पहचान करने में धोखा खाने से भी बचा जा सकेगा। 


कम्पनियां बना सकेंगी खुद का डाटाबेस
क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टैकनोलॉजी के लैक्चरर व आस्ट्रेलियाई प्राइवेसी फाउंडेशन के डायरैक्टर मोनिक मान (Monique Mann) ने द गार्डियन को बताया है कि इस नई फेशियल रिकोगनाइजेशन तकनीक से प्राइवेट कम्पनीज खुद अपना डाटाबेस बना सकेंगी। इस तकनीक को किसी भी तरह से क्रैक करना मुश्किल होगा।


सिक्योर होगा यह तकनीक
अटॉर्नी जनरल विभाग फिलहाल बड़े टैलिकॉम प्रमुख दूरसंचार कम्पनियों के साथ इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है, ताकि इस फेस वैरिफिकेशन सर्विस (FVS) का सही उपयोग किया जा सके। इस स्नङ्कस् तकनीक के तहत कम्पनियां ग्राहक की फेशियल इमेज को कैप्चर करेंगी और इसे "बॉयोमैट्रिक इंटरोपैराबिलिटी हब" में भेजा जाएगा। इस हब में नैशनल डाटाबेस में सेव किए गए पास्पोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे ऑफिशियल गवर्नमेंट रिकॉर्ड के साथ FVS के डाटा को मैच किया जाएगा जिससे किसी भी तरह से इस तकनीक को क्रैक करना कठिन होगा। माना जा रहा है कि यह तकनीक आईडेंटिटी फ्रॉड को कम करने में काफी सहायक साबित होगी। 

 

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